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हम चाहते क्या हैं?

हमने ब्लॉग की पूर्व की पोस्टों में परम्पराओं व् देखादेखी के दुष्प्रभावों के बारे में पढ़ा आज उन्ही सब बातों को थोडा इस कहानी के माध्यम से और अच्छे से समझने का प्रयास करते हैं।यह कहानी मैंने दैनिक भास्कर के मधुरिमा के अंक से साभार ली है।कहानी इस प्रकार है--      एक बार वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग किया।उन्होंने एक पिंजरे में चार बन्दर बंद करके एक कोने में केले लटका दिए।अब जब भी कोई बन्दर केलों की तरफ बढ़ता तो उसके साथ-साथ बाकी बंदरों पर भी ठण्डे पानी की बौछार होती।कुछ समय बाद इससे यह हुआ कि कोई एक बन्दर...

बीमारी है या हौव्वा

 जैसे-जैसे शिक्षा का विस्तार होता जा रहा है व्यक्ति अपने स्वास्थ्य को लेकर भी काफी जागरूक होता जा रहा है ,पहले जहाँ व्यक्ति अज्ञानता के चलते बिमारियों को दैवीय प्रकोप समझ कर उसका सही इलाज नहीं करवा पाता था और अकाल मृत्यु का दंश झेलने पर मजबूर था आज भी कई इलाके ऐसे हैं जो शिक्षा के वास्तविक स्वरुप से वंचित है और उन्ही पुरातन मान्यताओं के अनुसार ही अपना जीवन यापन कर रहे हैं आज भी उन इलाकों में वैसे ही झाड़ फूंक वाली इलाज की विधियाँ ही प्रचलित है ।लेकिन समय के साथ साथ वहां भी जागरूकता आने लगी है ।जो इला...

अपेक्षाएं न पालें तो ही अच्छा

मेरा बेटा दुनियां का सबसे आज्ञाकारी बेटा है भविष्य में यह परिवार का नाम रोशन करेगा,मेरे पड़ोसी बहुत अच्छे है कोई भी काम पड़ने पर कभी मना नहीं करते,फला ऑफिस में अपनी जान पहचान के अधिकारी है बस मजे ही मजे हैं इस ऑफिस में रोजाना काम पड़ता है अब तो चिंता की कोई बात ही नहीं है।ये कुछ ऐसी कपोलकल्पित भावनाएं कमोबेस हर व्यक्ति के अंतर्मन में बसी रहती है और ये ही जीवन में दुःखी करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है यदि व्यक्ति इन झूंठी आशाओं से ऊपर ऊठ जाये तो वो कभी दुःखी हो ही नहीं सकता।लेकिन व्यक्ति हमेशा इन अपेक्षाओं को छोड़ना ही नहीं चाहता और सारी सुख सुविधाएँ जुटाने के बाद भी अंदर से दुःखी बना रहता है वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अगर हम नजर दौड़ाएं तो अधिकांश वृद्ध लोग अपनी संतानो से संतुष्ट नजर नहीं आते और यदि वृद्धजन धार्मिक विचारधारा वाले हों तो उनका दुःख और ज्यादा बढ़ा हुआ होगा।यह बात सबको अटपटी जरूर लगेगी लेकिन मेरे विचार से यह सौ टका सही है क्योंकि सभी धर्मग्रंथो में और सभी धर्मगुरुओं के प्रवचनों में बड़े भावुक तरीके से माता पिता की सेवा के पुत्रों के कर्तव्यों का वर्णन किया जाता है...

देखा देखी का झगड़ा

अरे अपने पड़ोसी वर्मा जी का बेटा आई ए एस की तैयारी कर रहा है और तूँ जाने कहाँ खोया हुआ है क्या रखा है इन मार्केटिंग की किताबों में जो सारे दिन इन्ही से चिपका रहता है। वास्तव में मैं तो बड़ा ही बदकिस्मत हूँ कल तक मेरे सामने यूँ ही घूमने वाला वो आज कितने बड़े शो रूम का मालिक बना बैठा है मेरी तो यह लाइन ही गलत है इसमें उन्नति की कोई गुंजाइस ही नहीं है। देख वो कितना धर्मात्मा है सुबह उठकर सबसे पहले नहा धोकर मंदिर जाता है उसके बाद ही अपनी दिनचर्या प्रारंभ करता है और एक तू है आदि आदि ऐसे कितने ही किस्से हमें रोजमर्रा की जिंदगी में सुनने को मिलते हैं।और आज जितनी भी परेशानियां,जितनी भी आत्महत्त्याएं हो रही है उन सब का कारण बस इस प्रकार की कहानियां ही है।बेटे की रुचि फिल्मों में काम करने की है माता पिता उसे इंजीनियर बनाना चाहते हैं महज इसलिए की उन्होंने सुन रखा है की इंजीनियरिंग का आजकल बहुत क्रेज है बेटा दुविधा में है दूसरे अन्य लोग भी यही सलाह देते हैं की माता पिता तेरे भले के लिए ही कह रहे हैं तू अभी बच्चा है तू नहीं समझेगा तो तुझे वो ही करना चाहिए जो बड़े लोग कहते हैं और वह बच्चा अपने स...

लोग क्या कहेंगे?

यदि मैंने ऐसा नहीं किया या ऐसा करूँगा तो लोग क्या कहेंगे,कहीं मेरी और मेरे परिवार की इज्जत को बट्टा लग गया तो,नाते रिश्तेदारों में मेरी नाक कट गई तो आदि आदि। न जाने मनुष्य के मन में ऐसे ऐसे कितने विचार आते हैं जो उसको गुलामी की और धकेलने का काम तो करते ही हैं साथ ही उसके विकास में भी रोड़ा बनते है।प्रसिद्ध मोटिवेश्नल स्पीकर और अंतरास्ट्रीय ख्याति प्राप्त कम्पनी इमैजिन बाजार के चीफ संदीप माहेश्वरी तो इसे सबसे बड़ा रोग बतलाते हैं उनके शब्दों में "सबसे बड़ा रोग,क्या कहेंगे लोग" कहने का मतलब जो इस लोगों के कहने का विचार करता है वो अपनी जिंदगी की गाड़ी को ही अटका देता है और जो इसकी परवाह नहीं करता वो हर तरह से सफल होता है अरे भाई जब जिन्दगी अपनी है विचार अपने है तो फिर लोगों के कहने से डर कैसा इस दुनियां की जितनी जनसंख्या है उतने ही दिमाग है हर व्यक्ति के सोचने का अपना अलग तरीका है और यह भी सही है की हर व्यक्ति अपने हिसाब से सही ही होता है।क्योंकि जो भी कुछ वो अपने बारे में या हमारे बारे सोचता है में वो अपनी जगह बिल्कुल सही होता है इसी प्रकार हम कुछ करते है तो अपने हिसाब से सही ह...

गुरु बनाने की परम्परा

"गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागूं पांय, बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय।। महात्मा कबीर दास जी के लगभग 500 वर्ष पूर्व लिखित उपरोक्त दोहे का वर्तमान में जमकर लाभ उठाया जा रहा है।कल से ब्लॉग में परम्पराओं के अंधानुकरण पर चर्चा चल रही है इसी बात को आगे बढ़ाते हुए आज इस प्रचलित दोहे पर थोडा विचार करते हैं।उपरोक्त दोहे में कबीरदासजी ने गुरु की महिमा का बखान करते हुए उसे भगवान से भी ऊँचा दर्जा दिया है और उसे प्रथम वंदनीय बताया है।बात है भी सौ टका सही की गुरु ही हमारा मार्गदर्शक होता है और जो भी हमें मार्ग बताये वो सम्माननीय होना ही चाहिए।अब थोडा परम्परावादी दृष्टिकोण से इस बात पर विचार करते हैं।कबीर के समय में शिक्षा प्राप्त करने के लिए गुरुकुल हुआ करते थे जहाँ पर बालक के सर्वांगीण विकास का दायित्व गुरु ही संभाला करते थे वे ही बालक को लौकिक और पारलौकिक जो भी गुरुकुल की व्यवस्था होती थी उसके अनुसार उसके भविष्य का खाका खींचा करते थे इसमें उनका निजी हित न होकर सारा हित बालक का ही हुआ करता था तो जाहिर सी बात है जो व्यक्ति अपना सर्वस्व बालक के हित में समर्पित कर दे वो तो सम्माननीय हो...

परम्पराओं में उलझा मानव

लेख को शुरू करने से पहले में लेख के विषय में अपनी स्वयं क़ि सोच के बारे में बतलाना चाहता हूँ क़ि न तो में परम्पराओं का विरोधी हूँ और न ही समर्थक।में उस परम्परा को स्वीकार करने में बिल्कुल भी गुरेज नहीं करता जिनका मेरे वर्तमान जीवन में मुझे कोई फायदा नजर आता हो लेकिन परम्परा को महज इस आधार पर स्वीकार नहीं करता की उसे मेरा परिवार पीढ़ियों से मानता आ रहा है और जिसका वर्तमान में कोई लॉजिक नजर नहीं आता। मुझे कई बार आश्चर्य होता है क़ि द्वापर युग के श्रीकृष्ण से लेकर आज के मानव तक सभी ने इस संसार को निरंतर परिवर्तनशील माना है,यानि क़ि आज से कुछ समय पूर्व जो सत्य था वो आज भी सत्य हो यह जरुरी नहीं होता फिर भी सदियों पुरानी परम्परा को आज भी घसीटा जा रहा है यहाँ तक क़ि कई परिवारों में इनको लेकर आपसी मनमुटाव भी देखने को मिलते हैं यदि सास परम्परावादी हो और बहु थोड़ी वैज्ञानिक सोच वाली हो तो आपसी मनमुटाव स्वाभाविक ही है। चलिए ऐसी ही कुछ प्रचलित परम्पराओं पर विचार करते है।हिन्दू समाज में अमावस्या तिथि को किसी भी शुभ काम के लिए टाला जाता है यदि किसी को यात्रा पर जाना हो यहाँ तक की कई परिवारों में त...